संत कबीर

कोटि कोटि करम लागे रहे, एक क्रोध की लार। किया कराया सब गया, जब आया हंकार॥ या रचनेत संत कबीर

संत कबीर

पंडित होय के आसन मारे पंडित होय के आसन मारे, लंबी माला जपत है। अंतर तेरे कपट करतनी, सो भी साहब लिखता है ।। - डॉ.

संत कबीर

हीरा वहाँ न खोलिये हीरा वहाँ न खोलिये, जहाँ खोटी है हाट। कस करि बाँधो गाँठरी, ऊठ कर चालो बाट।। -