संत निवृत्तीनाथ

अनुभवाच्या गावी ज्ञान हैंचि फळ अनुभवाच्या गावी ज्ञान हैंचि फळ। विज्ञान केवळ वृक्ष तया।। साधनी स्वानुभव अनुभवी

संत आऊबाई

शून्य साकारलें साध्यांत दिसे। आकार नासे तेथें शून्याकार दिसे॥ शून्य तें सार शून्य तें सार। शून्य चराचर

समर्थ रामदास

राम आकाशीं पाताळी। राम नांदे भूमंडळी। राम योगियांचे मेळी। सर्व काळी शोभतो॥ राम नित्य निरंतरी। राम सबाह्य